जगदलपुर। कभी माओवादी हिंसा के डर से अपना घर-गांव छोडक़र आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में शरण लेने वाले हजारों आदिवासी परिवार अब फिर बस्तर लौट सकेंगे। माओवाद के खिलाफ निर्णायक लड़ाई के बाद बदले माहौल में इन प्रवासित परिवारों की घर वापसी और पुनर्वास की प्रक्रिया को प्रशासन ने तेज कर दिया है। दक्षिण बस्तर के सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर जिले से माओवादी हिंसा के दौर में बड़ी संख्या में परिवारों ने पलायन किया था। जान बचाने के लिए अपना गांव छोडऩे वाले इन परिवारों ने वर्षों तक दूसरे राज्यों में जीवन बिताया। अब बस्तर को माओवाद मुक्त बनाने की दिशा में हुई प्रगति के बाद प्रशासन इन परिवारों को उनके मूल गांवों में वापस बसाने की तैयारी कर रहा है।
तीनों जिलों के कलेक्टरों से कमिश्नर ने की बैठक

प्रवासित परिवारों की वापसी और पुनर्वास को लेकर बस्तर संभाग कमिश्नर डोमन सिंह ने सुकमा, दंतेवाड़ा और बीजापुर के कलेक्टरों के साथ वर्चुअल बैठक की। उन्होंने अधिकारियों को घर लौटने वाले परिवारों के पुनर्वास को संवेदनशीलता और सर्वोच्च प्राथमिकता के साथ सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। कमिश्नर ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में रह रहे प्रवासित परिवारों तक शासन की पुनर्वास पहल की जानकारी पहुंचाई जाए। साथ ही संबंधित ग्राम पंचायतों में नियमित शिविर लगाकर वापस लौटने के इच्छुक परिवारों की जानकारी जुटाने और उनका सर्वे करने को कहा गया है।
31 व्यक्तिगत…14 सामुदायिक योजनाओं से जोड़ेंगे
वापस आने वाले पात्र परिवारों को शासन की 31 व्यक्ति मूलक और 14 सामुदायिक योजनाओं का लाभ दिलाने की तैयारी है। प्रशासन का उद्देश्य केवल परिवारों को वापस लाना नहीं, बल्कि उन्हें मूलभूत सुविधाओं और सरकारी योजनाओं से जोडक़र स्थायी रूप से पुनर्वासित करना है।
सुकमा में लौटे 100 परिवार….हजारों अब भी इंतजार में
हाल ही में सुकमा जिले में करीब 100 प्रवासित परिवारों की वापसी हुई है। हालांकि अनुमान के अनुसार करीब 32 हजार लोग अब भी अपने मूल गांव लौटने का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में आने वाले दिनों में प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन परिवारों की पहचान, वापसी, पुनर्वास और उन्हें मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने की होगी।
‘बदले बस्तर में हरसंभव मदद मिलेगी’
जगदलपुर दौरे पर पहुंचे उप मुख्यमंत्री अरुण साव और वन मंत्री केदार कश्यप ने भी प्रवासित परिवारों की वापसी और पुनर्वास के लिए हरसंभव सहायता उपलब्ध कराने की बात कही है। सरकार की ओर से संकेत दिया गया है कि लंबे समय से अपने गांवों से दूर रह रहे परिवारों को फिर से अपने मूल स्थान पर बसाने में प्रशासन पूरी मदद करेगा।
घर वापसी सिर्फ पलायन खत्म करने की कवायद नहीं
प्रशासन के लिए यह पहल केवल परिवारों की वापसी तक सीमित नहीं है। वर्षों से दूसरे राज्यों में रह रहे परिवारों को वापस लाकर उनके गांवों में बसाना, उन्हें रोजगार, आवास, राशन, पेंशन, स्वास्थ्य, शिक्षा और अन्य सरकारी योजनाओं से जोडऩा भी बड़ी जिम्मेदारी होगी। यदि यह प्रक्रिया प्रभावी ढंग से आगे बढ़ती है तो माओवादी हिंसा के दौर में उजड़े बस्तर के कई गांवों में फिर से परिवारों की चहल-पहल लौट सकती है।






