जगदलपुर। विश्वप्रसिद्ध बस्तर दशहरा केवल रावण दहन से जुड़ा उत्सव नहीं, बल्कि सदियों पुरानी जनजातीय परंपराओं, आस्था और राजपरिवार के अनूठे संबंधों का जीवंत इतिहास है। इसकी हर रस्म के पीछे एक कहानी छिपी है। ऐसी ही एक परंपरा है बाहर रैनी, जिसमें राजपरिवार के सदस्य माड़िया जनजाति समुदाय के साथ नवाखानी करते हैं और विजयरथ को वापस राजमहल लाते हैं। मान्यता है कि करीब 600 साल पहले माड़िया समुदाय के लोग राजा से नाराज होकर विजयरथ को कुम्हड़ाकोट के जंगलों में छिपा देते थे। इसके बाद राजा स्वयं उन्हें मनाने पहुंचते थे और उनके साथ नई फसल का अन्न ग्रहण कर रथ को वापस लाते थे। आज भी यह परंपरा उसी ऐतिहासिक प्रसंग की याद दिलाती है।
चार किलोमीटर का सफर…रास्तेभर उत्सव का माहौल

बाहर रैनी की रस्म में राजपरिवार के सदस्य देवी-देवताओं के साथ राजमहल से करीब चार किलोमीटर दूर कुम्हड़ाकोट पहुंचते हैं। यहां माड़िया समुदाय के साथ नवाखानी की परंपरा निभाई जाती है। इसके बाद विजयरथ को लेकर राजपरिवार के सदस्य वापस राजमहल लौटते हैं। इस ऐतिहासिक रस्म को देखने के लिए बस्तर संभाग सहित आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। पूरे रास्ते उत्सव और पारंपरिक उल्लास का माहौल रहता है।
नई फसल के चावल से बनती है मां दंतेश्वरी के लिए खीर
बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव के अनुसार, बाहर रैनी को नवाखानी के नाम से भी जाना जाता है। इस रस्म में बस्तर संभाग के विभिन्न क्षेत्रों से देवी-देवता शामिल होते हैं। नई फसल के चावल को अलग-अलग इलाकों से एकत्र किया जाता है। इन्हीं चावलों से खीर तैयार कर मां दंतेश्वरी को भोग अर्पित किया जाता है। इस अवसर पर दंतेवाड़ा से मां दंतेश्वरी की छतरी भी उपस्थित होती है। मां का आशीर्वाद लेने के बाद श्रद्धालु प्रसाद ग्रहण करते हैं। इसी परंपरा के साथ उपवास समाप्त होने की मान्यता भी जुड़ी हुई है।
भीतर रैनी से जुड़ा है बाहर रैनी का ऐतिहासिक प्रसंग
बस्तर दशहरा की परंपराओं में बाहर रैनी और भीतर रैनी का विशेष महत्व है। लोकमान्यता के अनुसार, माड़िया समुदाय द्वारा विजयरथ को जंगल में छिपाने और राजा के उन्हें मनाकर रथ वापस लाने का प्रसंग इस परंपरा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। बाहर रैनी में नवाखानी और सामुदायिक मेल-मिलाप के बाद विजयरथ की वापसी होती है, जबकि भीतर रैनी की रस्म में रथ को वापस लाने की परंपरा का विशेष महत्व माना जाता है।
75 दिनों तक चलने वाला बस्तर दशहरा देश-दुनिया में अपनी अनूठी परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। इसकी रस्में केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि बस्तर के जनजातीय समाज, राजपरिवार और देवी-देवताओं के बीच सदियों से चले आ रहे संबंधों की कहानी भी कहती हैं। यही वजह है कि बस्तर दशहरा की परंपराएं आज भी लोगों की स्मृतियों और सांस्कृतिक विरासत में जीवंत हैं।






