जलकुंभी के स्थाई खात्मे की पहल नहीं…सिर्फ सफाई की हर बार होती है बात

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जगदलपुर। दलपत सागर की जलकुंभी हटाने और इसे साफ-सुथरा बनाने के नाम पर एक बार फिर बड़ी राशि खर्च होने जा रही है। बस्तर की ऐतिहासिक धरोहर दलपत सागर में जलकुंभी की समस्या नई नहीं है। इससे पहले भी इसकी सफाई और जलकुंभी हटाने पर करोड़ों रुपए खर्च किए जाने के बावजूद समस्या स्थायी रूप से खत्म नहीं हो सकी। अब एक बार फिर नगर निगम और एनएमडीसी नगरनार के बीच एमओयू हुआ है और जलकुंभी हटाने के लिए 50 लाख रुपए खर्च किए जाएंगे। एनएमडीसी नगरनार इस राशि को सीएसआर मद से उपलब्ध कराएगा। इसमें से पहले चरण के लिए 20 लाख रुपए की पहली किस्त जारी कर दी गई है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब पहले के अभियानों के बाद भी दलपत सागर जलकुंभी से मुक्त नहीं हो पाया तो इस बार ऐसी कौन-सी व्यवस्था की जा रही है, जिससे समस्या दोबारा न लौटे?

हर बार सफाई, फिर लौट आती है जलकुंभी

दलपत सागर में जलकुंभी लंबे समय से परेशानी बनी हुई है। समय-समय पर अभियान चलाकर इसे हटाया जाता रहा है। मशीनें लगाई जाती हैं, लाखों-करोड़ों रुपए खर्च होते हैं, लेकिन कुछ समय बाद फिर जलकुंभी पानी की सतह पर फैल जाती है। इससे सवाल केवल सफाई पर होने वाले खर्च का नहीं, बल्कि स्थायी समाधान की योजना पर भी है। यदि जलकुंभी के दोबारा फैलने के कारणों का समाधान नहीं किया गया तो इस बार खर्च होने वाले 50 लाख रुपए भी सिर्फ कुछ समय की राहत बनकर रह सकते हैं।

एमओयू को समझें, 20 लाख से शुरू होगा अभियान

सोमवार को हुए एमओयू के अनुसार एनएमडीसी नगरनार अपने सीएसआर मद से कुल 50 लाख रुपए देगा। पहले चरण के काम के लिए 20 लाख रुपए जारी किए जा चुके हैं। नगर निगम इस राशि से दलपत सागर में सफाई अभियान चलाएगा और जलकुंभी हटाई जाएगी। हालांकि, अब निगाह इस बात पर रहेगी कि सफाई के बाद जलकुंभी की रोकथाम के लिए क्या स्थायी व्यवस्था की जाती है।

करोड़ों खर्च के बाद भी समस्या जस की तस

दलपत सागर शहर की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक धरोहर है। इसके संरक्षण के नाम पर लंबे समय से अलग-अलग स्तर पर काम और अभियान होते रहे हैं। बावजूद इसके जलकुंभी की समस्या लगातार बनी हुई है। ऐसे में इस बार फिर 50 लाख रुपए खर्च किए जाने से शहरवासियों के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि हर साल सफाई पर पैसा खर्च करने के बजाय जलकुंभी के स्थायी समाधान पर काम क्यों नहीं किया गया?